सिंधिया राजवंश | Scindia dynasty

  • अठारहवीं सदी में उत्तर भारत में मराठों के विस्तार के परिणामस्वरूप मध्य भारत में एक नई सत्ता का बीजारोपण हुआ । यह नई सत्ता पूना के समीप स्थित कन्हेरखेइ गाँव (वर्तमान में सतारा जिले का एक गांव) से चलकर मराठा सेनापति के रूप में मराठों का यशवर्थन करने वाले शिंदे परिवार की थी । वही शिंदे परिवार बाद में सिंधिया राजवंश के रूप में जाना जाने लगा ।
  • औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् ग्वालियर आगरे के सूबे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहा, किन्तु दिल्ली की दुर्बलता और दक्षिण से मराठों के आक्रमण के कारण मुगलों की सत्ता क्षीण होती गई
  • 29 नवम्बर, 1728 में मालवा के हाकिम की मृत्यु के बाद मालवा के सूबे का प्रशासन पेशवा के विभिच्न सेनापतियों के हाथों में चला गया।
  • इन सेनापतियों ने राणेजी को मालवा में वसूल किए गए करों में होल्कर के साथ बराबरी का हिस्सा दिया ।
  • 2 नवम्बर, 1731 को पेशवा ने मालवा का राजकाज सिंधिया और होल्कर को सौंप दिया ।
  • रानोजी शिंदे, पेशवा बाजीराव प्रथम के सेनापति थे । उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों पर अपना अधिकार करते हुए 1731 ई. में उज्जैन को अपनी राजधानी बनाया । हालांकि ग्वालियर राज्य का संस्थापक उनके पुत्र महादजी शिंदे (सिंधिया) को माना जाता है ।
  • कुछ वर्षों पश्चात् राणेजी सिंधिया की मृत्यु सन् 1745 ई. में हो गई।
  • सन् 1761 में पानीपत के युद्ध के कारण उत्तर में मराठा प्रभुत्व को भारी आघात पहुँचा, किन्तु युद्ध भूमि में महादजी सिंधिया भाग निकला।
  • माहेट के जाट सरदार लोकेन्द्र सिंह ने पानीपत के युद्ध के पश्चात् गवालियर का किला हथिया लिया था, उसको महादजी सिंधिया द्वारा सन् 1765 में लेने में सफल हो गया ।
  • यहीं से गवालियर और उसके आसपास के मंडल से सिंधिया के राजवंश के ऐतिहासिक सम्बन्ध आरम्भ होते है ।
  • महादजी सिंधिया एक योग्य प्रशासक था
  • उसने मध्य भारत तथा उत्तरी भारत में मराठों की सत्ता को पुनस्थापित किया ।
  • इसी बीच बादशाह शाह आलम को निर्दयी गुलाम कादिर ने गिरफ्तार कर उसकी आँखे फोड़ दी ।
  • महादजी ने राजधानी की ओर कूच किया और शाह आलम को मुक्त कराया, बदले में महादजी का सम्राट ने अपना वकील बनाकर सभी प्रशासनिक अधिकारों से सुशोभित किया
  • पूना के पास वनवाड़ी में 12 फरवरी, 1794 को उसकी मृत्यु हो गई
  • महादजी शिंदे ने 1794 ई. में अपनी मृत्यु तक अपने शौर्य के बल पर ग्वालियर राज्य की सीमाओं का विस्तार किया । उत्तर में यमुना नदी से लेकर पश्चिम में राजपूताना, दशपुर अंचल तथा निमाड़ क्षेत्र तक यह राज्य विस्तृत हो गया था ।
  • महादजी शिंदे के उत्तराधिकारी दौलतराव सिंधिया ने फ्रेंच सेनापति डीबोयने द्वारा प्रशिक्षित मराठा सेना के माध्यम से ग्वालियर राज्य का और विस्तार किया, किन्तु अंग्रेजों के मराठों के साथ हुए द्वितीय युद्ध के दौरान उन्हें मराठा संघ के एक महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध लड़ना पड़ा ।
  • इसके पश्चात् दौलतरांव (1794-1827) उसका उत्तराधिकारी हुआ
  • उसने 1810 ई. में गवालियर को राजधानी बनाया । इससे पूर्व उसकी राजधानी उज्जैन थी
  • लगभग दो वर्षों तक चले इस युद्ध में दौलतराव सिंधिया की सेनाओं की पराजय हुई और 30 दिसंबर, 1803 ई. में सर्जीअर्जनगांव की संधि के जरिए रवालियर राज्य की सीमाओं को सीमित कर दिया गया
  • अंग्रेजों ने दौलतराव सिंधिया से उत्तर के प्रमुख क्षेत्र दिल्ली अलीगढ़ और आगरा तथा अहमदनगर, असाई, असीरगढ, अरगांव एवं गवालीगढ़ छीन लिए
  • 21 मार्च, 1827 को पुत्रविहीन दौलतराव स्वर्ग सिधार गये ।
  • उसके बाद जकोजी (1827-43) 7 फरवरी, 1843 तक प्रशासन कर सके। उसकी विधवा ताराबाई का दत्तक जयाजीराव (1843-1886) गद्दी पर बैठा ।
  • जब 1857 का विद्रोह उठ खड़ा हुआ । उस समय जयाजीराव केवल 23 वर्ष का युवक था ।
  • उसने ब्रिटिश मित्रों के प्रति निष्ठावान रहने का निर्णय किया
  • अंग्रेजों के साथ हुए तृतीय युद्ध में पेशवा बाजीराव द्वितीय की पराजय के फलस्वरूप अन्य मराठा सरदारों के साथ-साथ सिंधिया राजवंश को भी अंग्रेजों के साथ 5 नवंबर 1817 ई. में पुनः एक संधि करनी पड़ी, जो गवालियर की संधि के नाम से जानी जाती है ।
  • ग्वालियर की संधि के माध्यम से अंग्रेजों ने सिंधिया राजवंश से राजपूताने का आधिपत्य भी छीन लिया
  • 1857 ई. के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गवालियर राज्य के सत्ता सूत्र जयाजीराव सिंधिया (1843-1886) के हाथ में थे । उन्होंने 1886 ई. तक शासन करते हुए गवालियर राज्य के विकास का दौर प्रारंभ किया और उसे अमलीजामा पहनाने का कार्य किया उनके उत्तराधिकारी कर्नल सर माधवराव सिंधिया प्रथम थे ।
  • 1886 में जीवाजीराव की मृत्यु हो गई और माधवराव सिंधिया, 10 वर्षीय अवयस्क बालक, उत्तराधिकारी हुआ
  • उसे 15 अगस्त, 1894 को शासन की शक्तियाँ प्रदान की गई ।
  • उसके शासनकाल को सुढृढ़ीकरण और सुस्थिर प्रगति का काल भी कहा गया है ।
  • 6 जून, 1925 को उनकी मृत्यु हो गई
  • माधवराव सिंधिया प्रथम ने अपने 39 वर्ष के शासनकाल के दौरान र्वालियर नगर ही नहीं, बल्कि ग्वालियर राज्य के समग्र विकास के कार्य किए तथा गवालियर के आधुनिकीकरण का कार्य किया गया । जयविलास पैलेस का निर्माण, विक्टोरिया कॉलेज, फूलबाग, इटेलियन गार्डन, म्यूजियम का निर्माण आदि ।
  • जीवाजीराव सिंधिया जो उस समय 9 वर्ष के थे, उनके उत्तराधिकारी हुए
  • महाराजा के वयस्क होने तक रियासत का प्रशासन चलाने के लिए महारानी की अध्यक्षता में एक कौसिल ऑफ रीजेन्सी का गठन किया और 2 नवम्बर, 1936 को महाराजा को पूरे अधिकार सौंप दिये गये।
  • ग्वालियर राज्य के अंतिम शासक जार्ज जीवाजी राव सिंधिया थे, जिन्हें 21 तोपों की सलामी का अधिकार प्राप्त था । 15 जून, 1948 ई. को 68,251 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत ग्वालियर राज्य के महाराजा जीवाजी राव सिंधिया ने भारतीय संघ में विलय के प्रलेख पर हस्ताक्षर कर दिए
  • अप्रैल 1948 में दिल्ली में मध्य भारत के राजाओं के सम्मेलन में 25 रियासतों और गवालियर, इन्दौर तथा मांवा का संयुक्त संघ बनाया गया, जिसे मध्य भारत नाम दिया गया ।
  • मध्य भारत राज्य का उद्घाटन 28 मई, 1948 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने किया, जिसके पहले राज प्रमुख के रूप में जीवाजीराव सिंधिया ने शपथ ली ।

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