मध्य प्रदेश के प्रमुख राजवंश | मोर्य काल

मौर्य काल

नन्दों के पश्चात् मौर्यवंश का साम्राज्य रहा । मौर्य सम्राटों ने अवन्ति राष्ट्र नामक प्रान्त का गठन किया । उज्जयिनी इसकी राजथानी थी। 
मध्य प्रदेश में मौर्य सत्ता के व्यापक साक्ष्य मिले हैं ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु सांवी के स्तूप का निर्माण कराया था । 
चन्द्रगुप्त मौर्य के पुत्र बिन्दुसार के समय अवन्ति प्रदेश का उपराजा (वायसराय) अशोक था, जो अपने पिता (बिन्दुसार) की मृत्यु के पश्चात् मगध का शासक बना और जिसने देवानामप्रिय की उपाधि धारण की। 
ध्यातव्य है कि अवन्ति राज्य का गठन चन्द्रगुप्त मौर्य के समय किया गया था, जिसकी राजधानी उज्जयिनी थी । 
सांची के अतिरिक्त अशोक द्वारा आधुनिक विदिशा, सतधारा, सुनामी अन्धेर व भोजपुर में भी अनेक स्तूपों का निर्माण कराया गया 
मध्य प्रदेश का कुछ क्रमबद्ध इतिहास मौर्य काल में मिलता है ।
326-284 ईसा पूर्व का जबलपुर जिले की सिहोरा तहसील में स्थित रूपनाथ ग्राम की चट्टान पर अंकित अशोक का शिलालेख इस बात का ऐतिहासिक प्रमाण है । 
कूटनीतिज्ञ कौटिल्य की सहायता से चन्द्रगुप्त का राज्य लगभग सम्पूर्ण तत्कालीन भारत पर था ।
अशोक मौर्यवंश के संस्थापक सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य का पौत्र था ।
चन्द्रगुप्त ने यूनानियों के भारत विजय के स्वप्नों को चकनाचूर करते हुए सिकन्दर की पराजय का कारण बनने के साथ-साथ उसके प्रधान सेनापति सैल्यूकस को पराजित कर उसकी पुत्री हेलन से विवाह किया तथा अफगानिस्तान का विशाल भू-भाग दहेज में प्राप्त किया 
रूपनाथ की अशोक शिला यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि यह भाग उस समय मौर्य साम्राज्य में था 
सम्राट बिंदुसार ने अपने पुत्न युवराज अशोक को यहॉँ का राज्यपाल नियुक्त किया । अशोक ने विदिशा के श्रेष्ठी की पुत्री 'श्रीदेवी' से प्रेम विवाह किया 
श्रीदेवी भगवान बुद्ध की परिजन थी अशोक ने उज्जयिनी और कसरावद (निमाइ) में स्तूपों का निर्माण कराया और सम्राट बनने के बाद अशोक के साँची, रायसेन एवं भरहुत (सतना) के विश्व प्रसिद्ध स्तूपों का निर्माण कराया 
सम्राट अशोक ने रूपनाथ (जबलपुर), बेसनगर, पवाया, एरण आदि स्थानों पर स्तंभ स्थापित कराये थे 
इस युग में व्यापारिक मागों की संख्या चार थी, जिनमें तीसरा मार्ग दक्षिण में प्रतिष्ठान से उत्तर में श्रावस्ती तक जाता था । इसमें महिष्मती, उज्जैन, विदिशा आदि नगर स्थित थे । चौथा प्रसिद्ध व्यापारिक मार्ग शृगुकच्छ से मथुरा तक जाता था । जिसके रास्ते में उज्जयिनी पड़ता था
मौर्ययुगीन सम्राट अशोक के द्वारा निर्मित लघु शिलालेख में निम्न का संबंध वर्तमान मध्य प्रदेश राज्य से था, जिनमें
रूपनाथ (जबलपुर जिले के सिहोरा तहसील का एक गौँव)
गुर्जर (दतिया जिले का एक छोटा सा भू-भाग)
सारो मारो (शहडोल जिले का एक छोटा भू-भाग)
पनगुडरिया (सीहोर जिले का एक भाग) उल्लेखनीय थे, जबकि साँची (रायसेन जिले का भाग) स्थित लघु स्तम्भ लेख भी इन्हीं के द्वारा बनाए गए थे । ये लघु शिलालेख व लघु स्तंभ लेख इस बात के प्रमाण हैं कि इस राज्य (मध्य प्रदेश) में मौर्ययुगीन शासन व्यवस्था ही कायम थी
मौर्यकालीन ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण कई छोटे-बड़े शिलालेख राज्य के विभिन्न भागों में कई स्थानों से मिले हैं । ये स्थान-कारीतलाई, खरबई, कसरावद, आरंग तथा रामगढ़ इत्यादि है । 
विदिशा से हेलियोडोरस के स्तंभ के रूप में एक अनोखा स्मारक इस बात का प्रमाण है कि बौद्ध हिन्दू धर्म अपना सकते थे 
इस प्रकार दूसरी शताब्दी ई.पू. पारस्परिक धार्मिक सहिष्णुता प्रारंभ हो चली थी
चौथी-पाँचवीं शताब्दी में मध्य प्रदेश की उज्जैन नगरी को गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य द्वितीय की राजधानी होने का गौरव प्राप्त हुआ । 
मध्य प्रदेश में पाए गए स्वर्ण, रजत, ताँबा एवं मिट्टी धातु से बने सिक्के ( मुद्राँ) मध्य प्रदेश के इतिहास को जानने में सहायक होते हैं । 
जनपदीय एवं स्थानीय शासकों की मुद्राएँ त्रिपुरी, उज्जैन, विदिशा, एरण, महिष्मती आदि में मिली है। 
विभिन्न संग्रहालयों में सुरक्षित मुद्राएँ गोल तथा चौकोर हैं एवं ताँबे तथा मिश्र थातु की बनी हैं। 

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