मध्य प्रदेश के प्रमुख राजवंश | नाग वंश का काल

नाग वंश का काल

  • दूसरी शताब्दी ई. के अन्तिम चरण में मध्य प्रदेश के दक्षिणी क्षेत्र में राजनीतिक उथल-पुथल चल रही थी । इसी समय नागवंश का उदय हुआ ।
  • नागवंश का संस्थापक वृषनाथ था, जिसने दूसरी शताब्दी ई. के अंतिम चरण में विदिशा में इस वंश के नाम से प्रसिद्ध हुआ
  • 1913-14 के बेसनगर उत्खनन में नागों के सिक्के मिले हैं ।
  • शासक भीमनाग ने अपनी राजधानी विदिशा से स्थानांतरित की भीमनाग की
  • शासनकाल 210 ई. से 230 ई. के बीच था
  • गणपति नाग इस वंश का अन्तिम राजा था
  • इतिहासकारों ने साक्ष्यों के आधार पर यह स्पष्ट कर दिया है कि वासुदेव द्वितीय (कुषाण शासक) के समय तक कुषाण साम्राज्य का मध्य प्रदेश से प्रभात खत्म हो चुका था, क्योंकि इस समय तक राज्य में भारशित नागों का प्रभुत्व जम चुका था
  • पुराणों के विवरण से पता चलता है कि पद्मावती में नागकुलों का शासन था । पद्मावती की पहचान मध्य प्रदेश के ग्वालियर के समीप स्थित आधुनिक पद्मपवैया’ नामक स्थान से की जाती है।
  • पुराणों के अनुसार स्पष्ट है कि यहाँ पर नौ नागवंशीय राजाओं ने शासन किया
  • इस वंश के राजाओं ने कुषाण वंश के अन्तिम राजाओं की कमजोरी का लाभ उठाकर अपने साम्राज्य का विस्तार किया तथा विदेशियों को खदेइने में प्रमुख योगदान दिया
  • यहीं के नाग लोग भार शिव कहलाते थे, चूँकि वे अपने कन्धों पर शिवलिंग वहन करते थे । अतः इसी कारण ‘भारशिव’ कहलाते थे।
  • इन लोगों का वाकाटकों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध था ।
  • इस कुल के शासक भवनाग (305-40 ई.) की पुत्री का विवाह वाकाटक नरेश प्रवरसेन प्रथम के पुत्र के साथ हुआ था
  • नागवंशीय राजाओं की राजधानी पद्मावती थी
  • प्रयाग प्रशस्ति से स्पष्ट है कि गुप्त काल के शासक समुद्रुपुप्त के समय पद्यावती में इस वंश का शासक नागसेन था पुराणों के अनुसार विदिशा की पद्मावती के अतिरिक्त क्रान्तिपुरी (वर्तमान में कुटवार) में भी नागों की एक राजधानी थी

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