मध्य प्रदेश के प्रमुख राजवंश | सातवाहन वंश

सातवाहन वंश

  • कण्व वंश की शक्ति का नाश कर आन्ध्रदेशीय सातवाहनों ने 27 ई.पू. लगभग साम्राज्य की स्थापना की
  • पुराणों में इस वंश के संस्थापक का नाम सिंधु शिशुक और शिप्रक मिलता है । इसे भृत्य भी कहा गया है
  • इस वंश का पराक्रमी राजा शातकर्णी था । उसकी उपलब्धियों के सम्बन्ध में उसकी रानी नागानिका के नानाघाट अभिलेख से कुछ प्रकाश पड़ता है ।
  • साँची के बड़े स्तूप की वेदिका पर उत्कीर्ण एक लेख से शातकर्णी के पूर्वी मालवा क्षेत्र पर अधिकार का ज्ञान होता है
  • कुछ सातवाहन सिक्कों पर भी ‘राजा सिरि सात’ का नामांकन मिलता है।
  • ये सिक्के उज्जैन, देवास, जमुलिया (होशंगाबाद) तेवर, भेड़ाघाट, त्रिपुरी (जबलपुर) में 1951-52 तथा 1968-69 के उत्खनन में प्राप्त हुए हैं
  • विद्वानों का अनुमान है कि शातकर्णी साम्राज्य केवल मालवा तक ही नहीं, बल्कि डाहल प्रदेश तक हो गया था ।
  • गौतमी पुत्र शातकर्णी सातवाहन वंश का सबसे पराक्रमीराजा था।
  • उसके साम्राज्य में अनूप (माहिष्मती-आधुनिक महेश्षर के आस-पास का निमाड़), आगर (पूर्वी मालवा) तथा अवन्ति (पश्चिमी मालवा) भी शामिल था । उज्जैन से भी उसके सिकके प्राप्त हुए हैं।
  • गौतमी पुत्र के पश्चात् उसका पुत्र वासिष्ठी पुत्र पुलमायी के सिक्के भिलसा तथा देवास में प्राप्त हुए हैं।
  • इसका शासनकाल 130 ई. से 154 ई. तक था ।
  • अन्तिम प्रतापी सम्राट यज्ञश्री शातकर्णी था, जिसका शासनकाल 165 – 193 ई. तक था
  • मध्य प्रदेश में इनके सिक्के बेसनगर, तेवर और देवास से प्राप्त हुए हैं। दक्षिण कोसल में सातवाहनों के राज्य का उल्लेख चीनी यात्री हेनसांग के यात्रा विवरण में है।
  • इसकी पुष्टि विलासपुर जिले में सक्ती के निकट गुंजी में प्राप्त शिलालेख से भी होती है। जिसमें सातवाहन राजा कुमारदत्त का उल्लेख है
  • इस काल में रोम से व्यापार बढ़ा था, इसलिए रोम देश के सिक्के कुछ मध्य प्रदेश के आवरा, चकरवेड़ा तथा बिलासपुर में प्राप्त हुए हैं।

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