मध्य प्रदेश के लोकगीत

लोकगीत

निमाड़ क्षेत्रः

निमाड़ क्षेत्र में जीवन का कोई भी अवसर ऐसा नहीं होता, जब कोई गीत न गाया जाता हो जन्म, विवाह और मृत्यु आदि सोलहों संस्कारों के अवसरों पर अलग-अलग लोकधुनों में लोकगीत गाए जाते हैं। संस्कार गीत प्रायः महिलाएँ गाती हैं। पर्व-त्यौहार या अनुष्ठान में गीतों की प्रकृति स्त्री और पुरुष परक दोनों होती हैं।

निमाड़ क्षेत्रः के लोकगीत

निरगुणिया गायन शैली

  • इस गायन का क्षेत्र, सम्पूर्ण निमाड़ एवं मालवा अंचल में मिलता है।
  • यह गायन साधु एवं भिक्षुकों द्वारा किसी भी समय गाया जाता है।
  • इस गाने में कबीर, सूर. तुलसीदास, मीरा, रैदास, दादू, ब्रह्मानंद आदि कवियों के भजन काफी लोकप्रिय है।
  • इस गायन में आम तौर पर इकतारा और खरताल (लकड़ी से जुड़े छोटे धातु पटल वाला एक संगीत
  • उपकरण का उपयोग होता है। निगणिया गायन को नारदीय भजन भी कहा जाता है।

कलगी तुर्रा

  • यह एक प्राचीन लोकगायिकी है। यह सम्पूर्ण निमाड, अंचल क्षेत्र में आज भी प्रचलन में है।
  • यह कलगी दल शक्ति द्वारा-शिव की आराधना में, चांग की थाप पर रात के समय गाया जाता है।
  • इस लोकगीत में महाभारत के पौराणिक आख्यानों, आशु कविता से लेकर वर्तमान प्रसंगों का गायन सम्मिलित है।

मसाण्या (कायाखो )गीत

  • यह गीत निमाड़ अंचल क्षेत्र में गाया जाता है।
  • किसी व्यक्ति की मृत्यु पर उसकी आत्मा की अमरता की लोमान्यता के चलते इस गीत का गायन होता है, इसलिये इसे मसाण्या या कायाखो गीत कहते हैं।
  • इन गीतों को भी मृदंग, झांझ और इकतारा बजारा के समूहों में गाया जाता है।
  • मसाण्या गीतों में आत्मा को दुल्हन की संज्ञा गई है और शरीर को दुल्हा के रूप माना गया है।
  • मसाण्या को पुरुष परक लोकगीत कहा जाता है।

संत सिंगाजी भजन

  • 15वीं सदी के निर्गुणी संत-कवियों में से सबसे अग्रणी संत सिंगाजी हैं।
  • इनके भजनों को समूचे निमाड़ एवं मालवा के कुछ हिस्सों में गाया जाता है।
  • मृदंग और मंजीरे की संगत के साथ ऊँचे स्वर में भजन गाने की शैली स्वयं संत सिंगाजी ने विकसित की थी।
  • यह गीत किसी भी सामाजिक अवसर पर खेती और गृहस्थी संबंधी लोक प्रतीकों के साथ आध्यात्मिक भजन के रूप में समूह में गाया जाता है। .

फाग गायन

  • इस गायन का मुख्य क्षेत्र निमाड़, बुंदेलखंड एवं बघेलखंड है।
  • ये गीत प्राय: होली के अवसर पर गाए जाते हैं जो राधा और कृष्ण की लीलाओं से संबंधित होते हैं।

गरबा गीत

  • गरबा स्त्रीपरक लोक गायन है, जो दुर्गा देवी के अनुष्ठान में मुख्य रूप से निमाड़ क्षेत्र में गाया जाता है।
  • यह गीत मुख्य रूप से नवरात्र के अवसर पर देवी के भक्ति गीत के रूप में गाया जाता है।
  • इसमें गायन के साथ-साथ महिलाएँ नृत्य भी करती हैं।

नाथपंथी गायन

  • यह गायन निमाड़ अंचल क्षेत्रों में प्रचलित है।
  • इसे प्राय: सुबह के अवसर पर गाया जाता है जिसकी विषय-वस्तु कबीर के पद एवं भरथरी गायन से संबंधित होती है।
  • इसकी गायन शैली रेकड़ी बजाते हुए एकल गायन शैली के रूप में प्रसिद्ध है।

मालवा क्षेत्र:

मालवा मे पुंसवन, जन्म, मुंडन, जनेऊ, सगाई, विवाह के अवसर पर पारंपरिक लोकगीत गाने की प्रथा है। पर्व त्यौहार, ऋतु, अनुष्ठान संबंधी गीतों के गाने की परंपरा भी समूचे मालवांचल मे मिलती है। मालवी लोक गायन मे एक प्रकार से बोली की मिठास के साथ वहां की प्रकृति, धरती और संस्कृति की समृध्दि और सौन्दर्य का वर्णन सहज रूप से सुनाई देते हैं।

मालवा क्षेत्र: के लोकगीत

भरथरी गायन

  • मालवा के नाथ संप्रदाय से संबंधित लोग चिंकारा (सारंगी का एक रूप) की धुन पर भरथरी कथा गाते हैं।
  • यह प्रायः सुबह में नाथपंथी लोगों द्वारा गाया जाता है जिसकी विषय-वस्तु गोरख, कबीर, मीरा, भर्तृहरी आदि संतों द्वारा रचित भजनों पर आधारित होती है।
  • यह एकल एवं सामूहिक गायन शैली है।

संजा गीत

  • यह मालवा क्षेत्र में युवा लड़कियों के समूह द्वारा गाया जाने वाला गीत है।
  • यह गीत पितृ पक्ष के दौरान संध्या काल में संजा-पर्व के अवसर पर गाया जाता है।
  • इसमें गोबर एवं फूल-पत्तियों से दीवार पर संजा की आकृति या मांडने बनाकर उससे संबंधित बाल्यावस्था की कोमल भावनाओं वाले मंगल गीत गाए जाते हैं।
  • यह श्रवण गायन शैली है।

हीड़ गायन

  • मालवा के क्षेत्र में श्रावण के महीने में बिना वाद्य यंत्र के समूह में गाए जाने वाले लोक गीत को हीड़ गायन कहते है।
  • इस गायन में ग्यारस माता की कथा तथा कृषि संस्कृति के सूक्ष्म वर्णन वाले गीत गाए जाते है।
  • इसकी गायन शैली में कलाकार पूर्ण गले की आवाज़ के साथ और शास्त्रीय शैली में आलाप लेकर गाते हैं।

बघेलखण्ड क्षेत्र:

यह गायन शैली मध्य प्रदेश के अन्य अंचलों से थोडी भिन्न है, क्योंकि बघेली बोली अवधी से प्रभावित है। बघेली लोक गीतों का मूल स्वर तीव्र स्वर के माध्यम से है। पारम्परिक कल्पना के साथ सांस्कृतिक झाँकी भी प्रतिबिम्बित होती है।

बघेलखंड क्षेत्र के प्रमुख लोक गीत

बास देव

  • बास देव बघेलखंड का एक पारंपरिक गायक समुदाय है, जो लगभग सभी जातियों के होते है।
  • यह गीत हरबोले जाति के लोगों द्वारा अपने यजमानों के सामने दिन के समय में गाया जाता है।
  • इनकी गायन शैली में श्रवण कुमार की. कथा; रामायण के विभिन्न प्रसंग, कर्ण कथा आदि कथाओं एवं गाथाओं का सामूहिक गायन होता है।

बिरहा

  • बघेलखंड में बिरहा गायन परंपरा लगभग सभी जातियों में पाई जाती है।
  • बिरहा गीत प्रायः खेत, जंगल या खलिहानों में काम करते हुए, सवाल-जवाब के रूप में गाया जाता है।
  • ये गीत श्रृंगार रस से परिपूर्ण विरह वाले होते हैं ।

बिदेसिया

  • बिदेसिया गायन पूर बघेलखण्ड में गाया जाता है।
  • यह गीत प्रायः रात में जंगल व सुनसान जगहों में समूहो में गाया जाता है।
  • इसमें नायक एवं नायिका के विरह एवं मिलन की इच्छा के प्रेम गीत होते हैं जो लंबे आलाप
  • सहित एकल या सामूहिक रूप में गाए जाते है।

बरसाती बरता

  • यह गीत मालवा क्षेत्रों में बरसात के समय रात में गाया जाता है।
  • इसमें ऋतुओं के गीत, ऋतु कथाएँ एवं बारहमासा गीत का सामूहिक गायन होता हैं।
  • इसमें चम्पू काव्य की शैली सम्मिलित है।

बुंदेलखंड क्षेत्र:

इस क्षेत्र के लोक गीतों में शौर्य और उत्कष्ट श्रृंगार के भाव गुम्फित होते हैं। इन क्षेत्रों के गायन के तारत्व के दो मुख्य स्वर है. एक बडज और दसरा मध्यम पुरुषपरक। इसके अलावा बाल सुलभ लोक गायन का स्वर भी सम्मिलित होता है ।

बुंदेलखंड क्षेत्र के प्रमुख लोकगीत 

आल्हा गायन

  • यह मुख्यतः: बुंदेलखंड, क्षेत्रों में गाया जाता है जो वीर प्रधान काव्य है।
  • यह गीत प्रायः वर्षा ऋतु में रात के समय गाया जाता है।
  • इस गायन में महोबा के प्रसिद्ध शूर वीर आल्हा और ऊदल की युद्ध कथाओं को गाया जाता है।
  • यह उच्च स्वरों में गाए जाने वाली एकल एवं सामूहिक गायन शैली है।

बंबुलिया (भोला) गीत

  • बंबुलिया बुंदेलखंड की वाचिक परंपरा के मधुर गीत हैं जिन्हें लमटेस गीत भी कहा जाता है।
  • यह प्राय: शिवरात्रि, बसंत पंचमी एवं मकर संक्रान्ति जैसे अवसर पर गाया जाता है।
  • इसमें शिव-पार्वती की भक्ति वाले भजन होते हैं।
  • यह स्त्री-पुरुष के बीच में प्रश्नोत्तर शैली में गाया जाता है।

बेरायता गायन

  • यह बुंदेलखंड क्षेत्रों में मुख्य रूप से गाया जाता है।
  • बेरायता गायन प्राय: धार्मिक त्यौहारों पर रात्रि बेला में गाया जाता है। यह मुख्य रूप से कथा गायन शैली
  • है जिसमें महाभारत, रामायण, लोकनायकों और ऐतिहासिक चरित्रों की कथा एवं प्रसंगों का गायन होता है।
  • इस कथा गायन शैली में संवाद भी सम्मिलित होते है।

देवासी (देवरी) गायन

  • यह बुंदेलखंड के क्षेत्रों में दीपावली पर अहीर और बाल-ग्वालों द्वारा गाया जाता है।
  • इस गीत में राधा-कृष्ण प्रेम प्रसंग. भक्ति तथा वीर रस के संयुक्त दोहे सम्मिलित होते हैं।
  • इस शैली में दोहा गायन के साथ तेज गति से नाच भी शामिल होता है।

जगदेव का पुवारा

  • यह गीत बुंदेलखंड क्षेत्र में चैत्र और क्वार महीने में गाया जाता है।
  • इसमें शक्ति की आराधना से संबंधित भजन होते हैं जो सामूहिक रूप से गाए जाते है।

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