मध्य प्रदेश में कलचुरी वंश का इतिहास | History of Kalchuri Dynasty in Madhya Pradesh

कलचुरी वंश

  • मध्य प्रदेश में ही नहीं वरन् भारतवर्ष के प्राचीन इतिहास में कलदुरी नरेशों का स्थान कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है ।
  • सन् 550 ई. से लेकर 1740 ई. तक लगभग बारह सौ वर्षा तक की अवधि में कलचुरी नरेशों ने भारत के उत्तर अथवा दक्षिण स्थित किसी न किसी प्रदेश में अपना राज्य चलाया ।

माहिषमती के कलचुरी

  • कलचुरियों की प्राचीन राजधानी माहिष्मती थी, जहाँ से ये लोग छठी शताब्दी ई. पूर्वार्द में शक्तिशाली हुए ।
  • इस वंश के सर्वप्रथम ज्ञात शासक कृष्णराज (550 ई. 575 ई.) तक के चाँदी के सिक्के बेसनगर, तेवर तथा पह्टन से प्राप्त हुए हैं । इसके पश्चात् शंकरगढ़ तथा बुद्धराज आये ।
  • बुद्धराज को चालुक्य शासक मंगलेश से युद करना पड़ा, जिससे वह पराजित हुआ ।
  • अंत में उसके राज्य का एक बड़ा भाग पुलकेशी द्वारा छीन लिया गया।
  • इसके पश्चात् कलचुरी वंश की शक्ति क्षीण हो गयी ।

त्रिपुरी के कलचुरी

  • चालुक्यों से पराजित होने के पश्चात् बुदराज के वंशज माहिष्मती छोइकर चेदि वंश की ओर भाग आये तथा त्रिपुरी में अपनी राजधानी स्थापित की ।
  • कुछ विद्वानों का मत है कि इस शाखा का संस्थापक वामराजदेव था जिसने सातवीं शताब्दी के उत्तरार्द में कालंजर को जीतकर अपनी राजधानी वहाँ स्थापित की ।
  • शीघ्र ही उसने बघेलखण्ड को जीतकर उत्तर में गोमती नदी से दक्षिण सें नर्मदा तक अपने साम्राज्य का विस्तार कर लिया ।
  • इसी समय कलचुरियों की राजधानी कालंजर से नर्मदा तट पर त्रिपुरी में स्थानांतरित की गयी ।
  • वामराज के पश्चात् अगले शासक शंकरगण ने राष्ट्रकूट राजाओं की अधीनता स्वीकार कर ली ।

रत्नपुर के कलचुरी

  • नवीं शताब्दी ई. के अन्त में त्रिपुरी के कलचुरियों ने दक्षिण कोसल में अपनी शाखा स्थापित करने का प्रयत्न किया । अभिलेखों से यह ज्ञात होता है कि कोकल्ल प्रथम के पुत्र शंकगण द्वितीय अर्थात् मुग्धतुग प्रसिद्धधवल ने कोसल नरेश से पालि प्रदेश (बिलासपुर जिले के पालि नामक स्थान के आसपास का क्षेत्र) जीत लिया था इस समय यहाँ बाणवंशी विक्रमादित्य प्रथम राज्य कर रहा था
  • इससे अथवा इसके उत्तराधिकारी से शंकगण ने यह प्रदेश जीता होगा ।
  • शंकगण ने इस प्रदेश पर अपने छोटे भाई की नियुक्ति की, उसका नाम अज्ञात है, परन्तु अभिलेख यह उल्लेख करते हैँ कि उसकी राजधानी तुम्माण (बिलासपुर जिले का आधुनिक तुमाण) थी ।
  • यहाँ कलचुरियों ने दो-तीन पीढियाँ बिताई होंगी । तदुपरान्त वे स्वर्णपुर (आधुनिक सोनपुर) के सोमवंशी राजा द्वारा पराजित कर दिये गये ।
  • कोकल्ल द्वितीय के शासनकाल में कलिंगराज नामक कलचुरि राजपुत्र ने अपने बाहुबल से दक्षिण कोसल को जीतकर तुम्माण नगर में जहाँ उसके पूर्वजों ने राज्य किया था । अपनी राजथानी सथापित की यह घटना 1000 ई. के लगभग हुई होगी ।

रायपुर के कलचुरि

  • रायपुर की कलचुरि शाखा की स्थापना चौदहवीं शताब्दी ई. के अन्तिम चरण में हुई
  • इस शाखा में हुए राजा ब्रहादेव के दो शिलालेख अभी तक प्राप्त हुए है जिनमें से एक रायपुर से प्राप्त विक्रम संवत् 1458 (1402 ई.) का है और दूसरा खलारी से प्राप्त विक्रम संवत् 1470 (1415 ई.) का खलारी अभिलेख से विदित होता है कि ब्रह्मदेव के पूर्वज रामचन्द्र ने फणि (नाग) वंश के राजा भोणिगदेव को पराजित किया था ।
  • यह नाग राजा कवर्धा के नागवंश का था अथवा बस्तर का, यह कहना कठिन है
  • उपर्युक्त लेख से यह भी विदित होता है कि ब्रह्मादेत की राजधानी खल्वाटिका (आधुनिक खलारी रायपुर जिला) में थी ।

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