साइबर अपराध का आतंक पर निबन्ध

भूमिका- सूचना क्रांति ने पूरे विश्व को बादल दिया हैं। सारी दुनिया इंटरनेट के जरिए ऐसे जुड़ी हैं , जैसे एक ही परिवार के सदस्य हों। जहां इंटरनेट ने हमें अनेक सुविधाए दी हैं, वहीं ‘साइबर अपराध “का आतंक भी दिया हैं। जैसे-जैसे इसका प्रसार बढ़ रहा हैं उसी तीव्रता से साइबर अपराध का खतरा भी बढ़ रहा हैं। साइबर अपराधी संगणक वाइरस के माध्यम से इंटरनेट से जुड़े हुए संगणकोसे संचित सूचनाएँ, आंकड़े, प्रोग्राम को खत्म कर देते हैं। इस प्रकार से देशों और नस्लों की पारस्परिक दुश्मनी निकाली जाने लगी हैं। कोई पाकिस्तानी हैकर भारतीय वैबसाइटों को हैक कर देता है तो कोई चीनी हैकर अमरीकी वैबसाइटों पर डाका डाल रहे हैं।
विषय-वस्तु : साइबर अपराध के क्षेत्र में किए गए परीक्षण से पता चलता हैं कि हैकिंग की अधिकतर घटनाएँ पूर्व कर्मचारियों के सहयोग से ही होती हैं। लगभग अस्सी प्रतिशत बातों में पूर्व कर्मचारियों का हाथ था, वे इन हैकरों को कंपनी के “आँकड़ा कोश” तक पहुँचा देते हैं और इसके बाद पासवर्ड, क्रेडिट कार्ड नंबर आदि चुरा कर उन्हे खत्म कर देते हैं। कुछ ऐसी वेबसाइट्स हैं जो डिजिटल उपकरण उपलब्ध कराती हैं जो हैकिंग में मददगार होती हैं। इनकी सहायता से दूसरे संगणकों को जाम किया जाता हैं या नियंत्रण में लिया जाता हैं।
साइबर अपराधों से करोड़ों डॉलर का नुकसान होता हैं, अपराधी ई-मेल सिस्टम को जाम करते हैं, मोबाइल टेलीफोन कंपनियों के संगणकों में घुसपैठ कर वहाँ से कॉलिंग कार्ड चुरा कर लाखों का नुकसान पहुंचाते हैं कुछ वर्ष पूर्व अमेरिका में साइबर अपराधियों ने “मेलिसा” नामक वाइरस इंटरनेट पर फैला कर ई-मेल कम्पनियों को आठ करोड़ डॉलर का नुकसान दिया था । जानकार कहते हैं कि ब्रॉडबैंड के बढ़ते प्रचलन से साइबर अपराधी अपनी मर्जी से जब चाहें तब किसी भी संगणक तक पहुँच सकेंगे।
इस से समाज के सभी वर्ग के लोग चिंतित हैं, व्यापारी आज इंटरनेट से ही पूरी दुनिया से जुड़े हैं, इंटरनेट की इस असुरक्षा ने उनकी नींद हराम कर दी हैं। कई कंपनियों का मानना है कि उनके संगणकों के प्रयोग के बिना उनकी जानकारी अपराधियों ने प्राप्त की हैं। सरकारी विभागोंकी गोपनीय सूचनाएँ भी अब इन अपराधियों के पास हैं। इस अपराध को रोकने के लिए कई देशों को संधि करने पर विवश होना पड़ा हैं। यूरोपीय परिषद की एक समिति ने एक संधि मसौदे पर हस्ताक्षर किए हैं, जिस का उद्देशय साइबर अपराधों की रोकथाम करना हैं। इसके तहत इंटरनेट पर अधिक प्रभावी व्यवस्था करने, सुरक्षा उपाय बढ़ाने और साइबर अपराधियों की पहचान कर उन्हे कडा दंड देने की व्यवस्था की गयी हैं।
वर्ष 2000 में संसद में आई. टी. बिल 2000 के नाम से विधेयक लाकर एक नया कानून बनाया गया हैं । इसमें सूचना तकनीकी के क्षेत्र में गतिविधियों , अंतर्राष्ट्रीय व्यापार , आई.टी. उपकरणों के आयात-निर्यात, बुनियादी ढ़ाचे के विकास और साइबर अपराध रोकने के उपाय के लिए विस्तृत प्रावधान किए गए हैं। यह कानून साइबर अपराध के मामले में अदालत और पुलिस को एक ठोस कानूनी ढाँचा देता हैं। कोई भी नेटवर्क में वायरस नहीं डाल सकेगा ।
आईबी साइबर अपराधों की नकेल कसने के लिए भारत समेत नौ एशियाई देशों ने वर्ष 2000 में एक सहयोग समझोता किया कि यह देश ऑनलाइन नेटवर्किंग शुरू करेंगे । इन अपराधों की रोकथाम के लिए विश्व के सभी देशों के बीच सहयोग की आवश्यकता हैं ।
उपसंहार : इसी तरह, यदि दुनिया के अन्य देश भी सुरक्षा उपायों को मजबूत करें तथा नई तकनीकी का विकास करे तो इन अपराधों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता हैं। इसे रोकने में इंटरपोल भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता हैं।

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