बिहार की जलवायु |Climate of Bihar

  • बिहार में चार अलग-अलग मौसमों के साथ एक महाद्वीपीय मानसूनी जलवायु है। हिमालय से निकटता, समुद्र से दूरी और ऊपरी वायु परिसंचरण इसकी जलवायु को प्रभावित करते हैं। यहाँ की मृदा के वितरण में जलवायु, मूल सामग्री और स्थलाकृति का प्रभाव होता है। तीन अलग-अलग प्रकार की मृदा उत्तर बिहार के मैदान, दक्षिण बिहार के मैदान और दक्षिणी पठारी क्षेत्र में पाई जाती है।

बिहार की जलवायु

  • बिहार में महाद्वीपीय मानसूनी जलवायु होती है। समुद्र से बड़ी दूरी, हिमालय के पहाड़ों से निकटता, और ऊपरी वायु संचरण इसकी जलवायु को प्रभावित करते हैं। समुद्र के निकट होने के कारण पूर्वी भाग आर्द्र जलवायु का अनुभव करता है, जबकि महाद्वीपीय प्रभाव के कारण पश्चिमी भाग तुलनात्मक रूप से शुष्क होता है। हिमालय के निकट होने के कारण इसका उत्तरी भाग दक्षिणी भाग की तुलना में ठंडा होता है। पूर्वी भाग में 200 सेमी वर्षा होती है जबकि पश्चिमी भाग में 100 सेमी वर्षा होती है।
  • बंगाल की उत्तरी खाड़ी में उत्पन्न होने वाले उष्णकटिबंधीय चक्रवात का भी इसकी जलवायु पर बहुत प्रभाव पड़ता है। राजस्थान और आस-पास के क्षेत्र में विकसित कम दाब की बेल्ट बिहार के माध्यम से बंगाल की खाड़ी तक विस्तारित हो जाती है। इसके चलते ग्रीष्म ऋतु में बिहार में मॉनसून वर्षा होती है। बिहार की जलवायु को संशोधित मॉनसून जलवायु भी कहा जा सकता है।

गर्म मौसम ऋतु

  • गर्म मौसम मार्च में प्रारंभ होता है, और सूर्य के उत्तर की ओर गति के साथ, तापमान बढ़ता है और दाब लगातार घटता है। यह मई तक जारी रहता है। अप्रैल महीने में आर्द्रता सबसे कम होती है। तापमान पूर्व में 29 C से पश्चिम में 40 C के बीच रहता है। मैदानी इलाकों में पवनें उत्तर से पश्चिम की ओर चलती हैं। नार्वेस्टर बौछार के प्रभाव के कारण पूर्व में तापमान में गिरावट आती है। नॉरवेस्टर एक हिंसक स्थानीय चक्रवाती तूफान है। यह बिहार से उत्पन्न होकर पूर्व की ओर बढ़ता है। यह बिहार में लगभग 10 सेमी की वर्षा लाता है, जो बिजली, गरज और ओलावृष्टि के साथ होती है। हालांकि, यह पूर्व-खरीफ फसलों जूट, धान तथा आम और लीची जैसे कई फलों के लिए बेहद सहायक होती है। मई में गया सबसे गर्म होता है, इसका तापमान 47C तक पहुंच जाता है, जबकि मई का औसत तापमान 32C होता है।
  • अप्रैल के उत्तरार्ध और मई के दौरान मैदानों में गर्म झुलसा देने वाली ‘लू’ पवनें चलती है, जिनका औसत वेग 5-10 मील प्रति सेकंड हो सकता है। वे स्थानीय पवनें होती हैं, जो इस ऋतु के दौरान मनुष्य के आराम को प्रभावित करती है।

दक्षिण-पश्चिम मानसून

  • इन वर्षा-युक्त पवनों की शुरुआत का समय पूर्वी बिहार में 7 जून से लेकर पश्चिमी बिहार में 15 जून तक है। मैदानी इलाकों में एक निम्न दाब का केंद्र विकसित होता है जबकि बंगाल की खाड़ी के उत्तरी समुद्र पर उच्च दाब केंद्र विकसित होता है। इस दाबांतर के कारण वर्षायुक्त पवनें भारतीय मैदान की ओर चलती हैं। बिहार में मानसून के फटने को आमतौर पर गरज, बिजली और मूसलाधार वर्षा के साथ तीव्र चक्रवाती तूफान के अचानक आगमन के साथ जोड़ा जाता है।

मानसून प्रत्यावर्तन की ऋतु

  • अक्टूबर में, मानसूनी पवनें प्रत्यावर्तित होने (पीछे हटने) लगती हैं। हथिया नक्षत्र की अवधि में इस दौरान उष्णकटिबंधीय चक्रवाती वर्षा होती है। कभी-कभी, लगातार वर्षा होती है जिससे बाढ़ आ जाती है। उत्तर-पूर्वी बिहार में 100 मिमी से कम वर्षा होती है, जबकि उत्तर-पश्चिमी बिहार में 25 मिमी से कम वर्षा होती है।

वर्षा का वितरण

  • औसत वर्षा 112 सेमी है। यह पूर्वी भाग में अधिक है, अर्थात्, 200 सेमी, जबकि मैदानी इलाकों में, यह 100 से 150 सेमी है। उत्तर-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में 200 सेमी से अधिक वर्षा होती है। औरंगाबाद में सबसे कम वर्षा (95 सेमी) होती है, जबकि किशनगंज में सबसे अधिक वर्षा (173 सेमी) होती है।

ठंडा मौसम

  • यह ऋतु नवंबर से फरवरी तक रहती है। इसकी विशेषता कम तापमान, हल्की उत्तरी पवनें, स्वच्छ आकाश और कम आर्द्रता होती है। जनवरी सबसे ठंडा महीना होता है जब तापमान 7 C से 10 C के बीच रहता है। गया का तापमान सबसे कम दर्ज किया जाता है।
  • उत्तर-पश्चिमी भारत और दक्षिण-पूर्वी भारत में दाबांतर के कारण बिहार के मैदान में शीत लहरों का अनुभव होता है। दिसंबर-जनवरी के महीने में भूमध्य सागरीय क्षेत्र में उत्पन्न होने वाला शीतोष्ण चक्रवाती विक्षोभ (पश्चिमी विक्षोभ) इस क्षेत्र पर भी वर्षा का कारण बनता है। यह दाबांतर के कारण उत्पन्न होता है।

Leave a Comment