बाल श्रम पर निबन्ध | Child Labour essay in hindi

“जिनको जाना था, यहाँ पढ़ने को स्कूल।
जूतों पर पॉलिस करें, वो भविष्य के फूल।।”

ये पंक्तियाँ बाल-श्रम से जुड़े अभिशाप को व्यक्त करती हैं, जिसने शहरों और गाँवों में हर जगह अपना मकड़जाल बिछाया हुआ है। खेलने-कूदने की उम्र में बच्चा श्रम करने के लिए विवश हो जाए, इससे अधिक विडम्बना एक विकसित होते समाज के लिए और क्या हो सकती है ? बाल श्रम एक बहुत ही गम्भीर समस्या है, यह मानवाधिकारों का हनन करती है |
भारत में लगभग 40 प्रतिशत से भी अधिक लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर हैं। यहाँ अभिभावकों द्वारा धनाभाव को दूर करने के लिए अपने बच्चों को शिक्षा व खेल-कूद से वंचित कर, श्रम करने के लिए विवश किया जाता है। कड़कड़ाती ठण्ड, हो भीषण गर्मी हो या बरसात हो छोटे बच्चे कैंटीन, रेस्तरां रासायनिक कारखानों तथा अनेक फैक्ट्रियों में काम करते हुए दिखाई देते हैं।
भारतीय संविधान में बाल-श्रम रोकने के लिए विभिन्न प्रावधान किए गए हैं। जैसे- 14 वर्ष से कम आयु के किसी बालक को किसी भी रोजगार के लिए नियुक्त नहीं किया जाएगा। सभी बालकों को जब तक वे 14 वर्ष की आयु पूरी नहीं कर लेते, राज्य निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करेगा।
बाल-श्रम निषेध अधिनियम-1986, पहला अधिनियम है, जिसके अंतर्गत सरकार ने देश के अधिकतर जिलों में राष्ट्रीय बाल-श्रम प्रोजेक्ट तथा इण्डस प्रोजेक्ट द्वारा जिलाधिकारियों को यह आदेश दिया हुआ है कि वे बाल-श्रम रोकने की हर सम्भव कोशिश करें।
वर्तमान समय में भारत सरकार बाल-श्रम को रोकने की दिशा में काफी प्रयास कर रही है। इस कार्य में गैर-सरकारी संगठन एनजीओ भी समान रूप से सहयोग कर रहे हैं। ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ में एनजीओ ने बहुत सराहनीय काम किया
बाल-श्रम केवल एक बीमारी ही नहीं अपितु कई बीमारियों की जड़ है। इस कुरीति को रोकने का दायित्व सिर्फ सरकार का ही नहीं बल्कि हम सबका है। यह समस्या हमारी प्रगति, शिक्षा, योग्यता, संवेदना तथा मानवता पर अनेक सवाल खड़े करती है। यदि हम सब मिलकर बाल-श्रम को रोकने की एक सार्थक पहल करें तो राष्ट्र के निर्माण की स्वभाविकता बनी रहेगी।

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