1857 की क्रांति

भारत से अंग्रेजी शासन को हटाने का पहला संगठित प्रयास 1857 की महान क्रांनि के रूप में सामने आया भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की बढ़ती उपनिनेशवादी नीतियों एवं शोषण के खिलाफ इस आंदोलन की शुरुआत हुई |

तात्कालिक कारण Immediate reason

  • 1856 में अंग्रेजों ने पुरानी बंदूक ब्राऊन बैस के स्थान पर नई एनफील्ड राइफल को प्रयोग करने का निर्णय लिया। जब कंपनी की सेना की बंगाल इकाई में ‘एनफील्ड पी.53’ राइफल में नई कारतूसों का इस्तेमाल शुरू हुआ तो इन कारतूसों को बंदूक में डालने से पहले मुंह से खोलना पड़ता था। सैनिकों के बीच ऐसी खबर फैल गई कि इन कारतूसों को बनाने में गाय तथा सूअर की चर्बी का प्रयोग किया जाता है जो कि हिन्दू और मुसलमानों दोनों के लिए गंभीर और धार्मिक विषय था।
  • 9 फरवरी 1857 को जब यह कारतूस देशी पैदल सेना को बांटा गया नब मंगल पाण्डेय ने उसे न लेने को लेकर विद्रोह जता दिया।
  • मंगल पांडे ने रायफल से अंग्रेज अधिकारी मेजर हयूसन को मौत के घाट उतार दिया। पांडे ने एक और अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट बॉंघ को भी मौत के घाट उतार दिया।
  • मंगल पांडे एक भारतीय सिपाही थे जिन्होंने 1857 के भारतीय विद्रोह के तुरंत बाद होने वाले आयोजनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वह त्रिटिश ईस्टि इंडिया कंपनी की 34वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री रेजिमेंट में सिपाही थे।
  • मंगल पांडेय ने बैरकपुर छावनी में 29 मार्च 1857 को अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजा दिया। मंगल द्वारा बिद्रोह किए जाने के एक महीने बाद ही 10 मई को मेरठ की सैनिक छावनी में भी बगावत हुई और यह विद्रोह पूरे उत्तर भारत में फैल गया।
  • इस घटना के बाद उन्हें अंग्रेज सिपाहियों द्वारा गिरफ्तार किया गया और उन पर कोर्ट मार्शल द्वारा मुकदमा चलाकर 6 अप्रैल 1857 को फांसी की सजा सुना दी गई।
  • फैसले के अनुसार उन्हें 18 अप्रैल 1857 को फांसी दी जानी थी, लेकिन अंग्रेजों द्वारा मंगल पांडे को दस दिन पूर्व ही 8 अप्रैल सन् 1857 को बैरकपुर में फांसी दे दी गई।
  • 24 अप्रैल को 3 एल सी परेड मेरठ में 90 घुड़सवारों में से 85 सैनिकों ने नए कारतूस लेने से इंकार कर दिया। आज्ञा की अवहेलना के कारण इन 85 घुड़सवारों को कोर्ट मार्शल द्वारा 5 वर्ष का कारावास दिया गया।
  • 9 मई को मेरठ में 85 सैनिकों ने नई राइफल इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया जिनको नौ साल जेल की सजा सुनाई गई।
  • 10 मई, 1857 ई. के दिन मेरठ की पैदल टुकडी 20 N.I. से 1857 ई. की क्रांति की शुरूआत हुई।

राजनीतिक कारण/ Political reasons-

1857 के विद्रोह्र का प्रमुख राजनीतिक कारण ब्रिटिश सरकार की 'गोद निषेध प्रथा' या 'हड़प नीति' थी। यह अंग्रेजों की विस्तारवादी नीति थी जो ब्रिटिश भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी के दिमाग की उपज थी। कंपनी के गवर्नर जनरलों ने भारतीय राज्यों को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाने के उद्देश्य से कई नियम बनाए
उदाहरण के लिए, किसी राजा के नि:संतान होने पर उसका राज्य ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बन जाता था। इस नीति के कारण भारतीय राजाओं में बहुत असंतोष पैदा हुआ था। रानी लक्ष्मी बाई के दत्तक पुत्र को झांसी की गद्वी पर नहीं बैठने दिया गया। हृड़प नीति के तहत ब्रिटिश शासन ने सतारा, नागपुर और झांसी को ब्रिटिश राज्य में मिला लिया। इसके अलावा बाजीराव द्वितीय के दत्तिक पुत्र नाना साहेब की पेंशन रोक दी गई जिससे भारत के शासक वर्ग में विद्रोह की भावना मजबूत होने लगी।
लोगो के अंदर विद्रोह और भड़का जब बहादुर शाह द्वितीय के वंशजों को लाल किले में रहने पर पाबंदी लगा दी गई़।
कुशासन के नाम पर लार्ड डलहीजी ने अवध का विलय करा लिया जिससे ब़ड़ी संख्या में बुद्धिजीवी, अधिकारी एवं सैनिक बेरोजगार हो गए। इस घटना के बाद जो अवध पहले तक ब्रिटिश शासन का वफादार था, अब्र विद्रोही बन गया।

सामाजिक एवं धार्मिक कारण Social and religious reasons

भारत में तेजी से पैर पसारती पश्चिमी सभ्यता को लेकर समाज के बड़े वर्ग में आक्रोश था | 1850 में ब्रिटिश सरकार ने हिन्दुओं के उत्तराधिकार कानून में बदलाव केर दिया और अब क्रिस्चियन धर्म अपनाने वाला हिंदू ही अपने पूर्वजों की संपत्ति में हकदार बन सकता था। इसकें अलावा मिशनरियों को पूरे भारत में धर्म परिवर्तन की छूट मिल गई थी। लोगों को लगा कि ब्रिटिश सरकार भारतीय लोगों की क्रिस्चियन बनाना चाहती है। भारतीय समाज में संदियों से चली आ रही कुछ प्रथाओं (जैसे-सती प्रथा) को समाप्त करने पर लोगों के मते में असंतोष पैदा हआ।

आर्थिक कारण Economic Reason-

  • भारी टैक्स और राजस्व संग्रहण के कड़े नियमों के कारण किसान और जमींदार वर्गों में असंतोष था। इन सबमें से बहत से ब्रिटिश सरकार की टैक्स मांग को पूरा करने में अक्षम थे और वे साहूकारों का कर्ज चुका नहीं पा रहे थे जिससे अंत में उनको अपनी पुश्तैनी जमीन से हाथ धोना पड़ता था। बड़ी संख्या में सिपाहियों का इन किसानों से संबंध था और इसलिए किसानों की पीड़ा से वे भी प्रभावित हुए।
  • इंगलैंड में औद्योगिक क्रांति के बाद भारतीय बाजार ब्रिटेन में निर्मित उत्पादों से पट गए। इससे भारत का स्थानिय कपड़ा उद्योग खासतौर पर तबाह हो गया। भारत के हस्तशिल्प उद्योग ब्रिटेन के मशीन से बने सस्ते सामानों का मुकाबला नहीं कर पाए। भारत कच्ची सामग्री का सप्लायर और ब्रिटेन में बने सामानों का उपभोक्ता बन गया। जो लोग अपनी आजीविका के लिए शाही संरक्षण पर आश्रित थे, सभी बेरोजगार हो गए। इसलिए अंगेजों के खिलाफ उनमें कोफी गुस्सा भरा हुआ था।

सैन्य कारण Military reasons-

  • भारत में ब्रिटिश सेना में 87 फीसदी से ज्यादा भारतीय सैनिक थे। उनको ब्रिटिश सैनिकों की तुलना में कमतर माना जाता था। एक ही रैंक के भारतीय सिपाही को यूरोपीय सिपाही के मुकाबले कम वेतन दिया जाता था। इसके अलावा भारतीय सिपाही को सूबेदार रेंक के ऊपर प्रोन्नति नहंं सिल सकती थी। इसके अलावा भारत में ब्रिटिश शासन के विस्तार के बाद भारतीय सिपाहियों की स्थिति बुरी तरह प्रभावित हुई। उनको अपने घरों से काफी दूर-दूर सेवा देनी पड़ती थी। 1856 में लार्ड कैर्निंग ने एक नियम जारी क्यिया जिसके मुताबिक सैनिकों को भारत के बाहर भी सेवा देनी पड़ सकती थी।
  • बंगाल आर्मी में अवध के उच्च समुदाय के लोगों की भर्ती की गई थी | उनकी धार्मिक मान्यातों के मुताबिक़, उनका समुद्र (कालापानी) पार करना वर्जित था। उन लोगों को लार्ड कैर्निंग के नियम से शक हुआ कि ब्रिटिश सरकार उन लोगों को क्रिश्चियन बनाने पर तुली हुई है। अवध के विलय के बाद नवाब की सेना को भंग कर दिया गया। उनके सिपाही बेरोजगार हो गए और ब्रिटिश हुकूमत के कट्टर दुश्मन बन गए।

विद्रोह का प्रसार Spread of rebellion

  • हत्या कर दी और जेल को तोड़ दिया। 10 मई को वे दिल्ली के लिए आगे बढ़े। 11 मई को मेरठ के क्रांतिकारी सैतिकों ने दिल्ली पहुंचकर, 12 मई को दिल्ली पर अधिकार कर लिया। इन सैनिकों ने मुगल सम्राट बहादुरशाह द्वितीय की दिल्ली का सम्राट घोषित कर दिया।
  • शीघ्र ही विद्रोह लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, बरेली, बनारस, बिहार और झांसी में भी फिल गया। अंग्रेजों ने पंजाब से सेना बुलाकर सबसे पहले दिल्ली पर अधिकार किया। 21 सितंबर, 1857 ई को दिल्ली पर अंग्रेजों ने पुन: अधिकार कर लिया, परन्तु संघर्ष में ‘जाँन निकोलसन’ मारा गया और लेफ्टिनेंट ‘हडसने ने धोखे से बहादुरशाह द्वितीय के दो पुत्रों, मिर्जा मुगल’ और ‘मिर्जा ख्वाजा सुल्तान’ एवं एक पोते ‘मिर्जा अबूबक्र’ को गोली मरवा दी।
  • लखनऊ में विद्रोह की शुरुआत 4 जून, 1857 ई का हूई। यहां के क्रांतिकारी सैनिकों द्वारा ब्रिटिश रेजिडेंसी के घेराव के बाद ब्रिटिश रेजिडेंट ‘हेनरी लॉरेन्स’ की मूत्यु हो गई। हैवलॉक और आउट्रम ने लखनऊ में विद्रोह को दबाने का भरसक प्रयत्न किया, लेकिन वे असफल रहे। आखिर में कॉलिन कैंपवेल’ ने गोरखा रेजिमेंट के सहुयोग से मार्च, 1858 ई में शहर पर अधिकार कर लिया।

बगावत को कुचलना Suppress the Rebellion-

1857 का संग्राम एक साल से ज्यादा समय तक चला। इसे 1858 के मध्य में कुचला गया। मेरठ में विद्रोह भड़कने के चौदह महीने बाद 8 जुलाई, 1858 को आखिरकार कैनिंग ने घोषणा किया कि विद्रोह को पूरी तरह दबा दिया गया है।

विद्रोह की असफलता के कारण Due to failure of rebellion-

सीमित आंदोलन Limited movement-

बहुत कम समय में आंदोलन देश के कई हिस्सों तक पहुंच गया लेकिन देश के एक बड़े हिस्से पर् इसका कोई असर नहीं पड़ा। खासतौर पर दोआब क्षेत्र में इसका असर रहा। दक्षिण के प्रांतों ने इसमें कोई हिस्सा नहीं लिया। अहम शासकों जैसे सिंधिया, होल्कर, जोधपुर के राणा और अन्यों ने विद्रोह का समर्थन नहीं किया।

प्रभावी नेतृत्व का अभाव Lack of effective leadership-

  • विद्रोह के लिए असरदार नेतृत्व का अभाव था। नाना साहेब, तांत्या टोपे और रानी लक्ष्मी बाई की बहादुरी में कोई शक नहीं है लेकिन वे आंदोलन को राष्ट्रिय स्तर पर असरदार नेतृत्व नहीं दे सके। इसके अलावा विद्रोहियों में अनुभव, संगठन क्षमता व मिलकर कार्य करने की शक्ति की कमी थी।
  • विद्रोही क्रांतिकारियों के पास ऊोस लक्ष्य एवं स्पष्ट योजना का अभाव था। उन्हें अगले क्षण क्या करना होगा और कैसे, यह भी निश्रित नहीं था। वे मात्र भावावेश एवं परिस्थितिवश आगे बढ़े जा रहे थे।
  • सैनिक दुर्बलता का विद्रोह की असफलता में महत्वपूर्ण योगदान रहा। बहादुरशाह जफर और नाना साहब एक कुशल संगठिनकर्ता अवश्य थे, पर उनमें सैन्य नेतत्व की क्षमता की कमी थी, जबकि अंग्रेजी सेना के पास लॉरिन्स ब्रदर्स, निकोलसन, हेवलाँक, आउट्रेस एवं एडवर्ड जैसे कुशल सेनानायक थे।

सीमित संसाधन Limited resources

  • विद्रोहियों के पास न संख्याबल था और न पैसा। उसके उलट ब्रिटिश सेना के पास बड़ी संख्या में सैनिक, पैसा और हथियार थे जिसके बल पर वे विद्रोह को कुचलने में सफल रहे।

मध्यम वर्ग का हिस्सा न लेना Not taking part of middle class-

  • 1857 के इस विद्रोह के प्रति ‘शिक्षित वर्ग’ पूर्ण रूप से उदासीन रहा। व्यापारियों एवं शिक्षित वर्ग ने कलक्त्ता एवं बंबई में सभाएं कर अंग्रेजों की सफलता के लिए प्रार्थना भी की थी। अगर इस वर्ग ने अपने लेखों एवं भाषणों द्वारा लोगों में उत्साह का संचार किया होता, तो नि:संदेह ही क्रांति के इस विद्रोह का परिणाम कुछ ओर ही होता।
  • 1857 ई. में क्रांति के समय भारत का गबर्नर जेनरल लॉर्ड कैर्निंग एवं इंगलैड के प्रधानमंत्री पामर्स्टन (लिबरल) थे।
  • भारत के स्वाधीनता संग्राम में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के लिए भारत सरकार द्वारा उनके सम्मान में सन् 1984 में एक डाक टिकट जारी किया गया।

विद्रोह के परिणाम Rebellion results

विद्रोह के समाप्त होने के बाद 1858 ई में ब्रिटिश संसद ने एक कानून पारित कर ईस्ट इंडिया कंपनी के अस्तित्व को समाप्त कर दिया, और अब भारत पर शासन का पूरा अधिकार महारानी विक्टोरिया के हाथों में आ गया। इंग्लैंड में 1858 ई के अधिनियम के तहत एक 'भारतीय राज्य सचिव' की व्यवस्था की गयी, जिसकी सहायता के लिए 15 सदस्यों की एक 'मंत्रणा परिषद्' बनाई गई। इन 15 सदस्यों में 8 की नियुक्ति सरकार द्वारा करने तथा 7 की 'कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स' द्वारा चुनने की व्यवस्था की गई।

राज्य हड़प नीति की समाप्ति End Of Doctrine of Lapse policy-

  • ब्रिटिश सरकार की हड़प नीति को समाप्त कर दिया गया। कानूनी वारिस के तौर पर पुत्र गोद लेने के अधिकार को स्वीकार किया गया। 1857 का विद्रोह इसलिए भी अहम था क्योंकि भारत की आजादी की लड़ाई के लिए इसकी वजह से मार्ग प्रशस्त हुआ।
  • 1857 की क्रांति के असफलता के उपरान्त सेना में अंग्रेज सैनिकों और पदाधिकारियों की संख्या में वृद्धि की गयी। बंगाल की सेना में भारतीयों और अंग्रेज सैनिकों का अनुपात 2:1 का रखा गया, बम्बई और मद्रास की सेनाओं मे यह अनुपात 5:2 का रखा गया।
  • बिहार, अवध तथा अन्य उन स्थानों के व्यक्तियों को, जिन्होंने 1857 ई. के क्रांति में भाग लिया था, गैर लड़ाकू घोषित किया गया और सेना में उनकी संख्या कम कर दी गई तथा सिख, गोरखा और पठानों को जिन्होंने 1857 के क्रांति को दबाने में अंग्रेजों की मदद की थी, लडाकू जातियाँ घोषित की गयी और उन्हें बडी संख्या मे सेना में भर्ती किया ग्या ।

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