मध्य प्रदेश के प्रमुख राजवंश | कुषाण राजवंश मोर्योत्तर काल

  • हुविष्ठ के सिकके झाझापुरी, शहडोल तथा हरदा से मिले है । हुविष्ठ ने 138 ई. तक राज्य किया
  • आरा से प्राप्त अभिलेख एक में कनिष्क का उल्लेख मिलता है।
  • भेड़ाघाट से कुषाणकालीन दो मूर्ति लेख तथा कुषाणकालीन गांधार कला की बौद्ध प्रतिमाओं की प्राप्ति हुई है।
  • कुषाण वंश का सर्वप्रथम महत्वपूर्ण राजा कुजुल कडफिसेस था।
  • उसकी मृत्यु के उपरान्त विम कडफिसेस उत्तराधिकारी हुआ।
  • मध्य प्रदेश के विदिशा ज़ले से उसका एक सिक्का प्राप्त किया गया है
  • विम कडफिसेस का उत्तराधिकारी कनिष्क प्रथम था । जिसने 78 ई. में शक संवत् का प्रारम्भ किया।
  • कनिष्क प्रथम के 324 सिक्के कुषाण शासकों की निधि से शहडोल से प्राप्त हुए हैं।
  • वासिष्क कनिष्क प्रथम का उत्तराधिकारी बना ।
  • मथुरा व साँची से उसके शासनकल के अभिलेख प्राप्त हुए
  • वासिष्क के बाद हुविष्क सिंहासन पर बैठा, जिसका मध्य प्रदेश के एक बड़े भू-भाग पर अधिकार था
  • हुविष्क के पश्चात् वासुदेव प्रथम कुषाण साम्राज्य का उत्तराधिकारी बना।
  • उसकी तिथियाँ 67 से 98 तक मिलती है, जिससे निष्कर्ष निकलता है कि उसने कम से कम 176 ई. तक राज्य किया
  • वासुदेव प्रथम द्वारा चलाया गया एक तॉबे का सिक्का जबलपुर जिले में स्थित तेवर (प्राचीन त्रिपुरी) नामक स्थान से प्राप्त हुआ है
  • इस वंश का अन्तिम नरेश वासुदेव द्वितीय प्रतीत होता है जिसके शासनकाल के पश्चात् इस वंश का पूर्णतः विलोप हो गया ।
  • साँची से कनिष्क संवत् 28 का एक लेख मिला है। यह वासिष्क का है तथा बौद्ध प्रतिमा पर खुदा हुआ है।
  • वासिष्क की किसी उपलब्धि का ज्ञान प्राप्त नहीं है ।
  • उसका शासन मात्र 4 वर्षों का था। अतः तब कहा जा सकता है कि यह भू-भाग कनिष्क द्वारा ही विजित किया गया होगा
  • इस लेख, में ‘वासु’ नामक किसी राजा का उल्लेख मिलता है । यह संभवतः कनिष्क के समय से मालवा प्रदेश का उप-राजा रहा होगा।
  • सोतों से ऐसा ज्ञात होता है कि दक्षिण से कम से कम विंध्य पर्वत तक कनिष्क का साम्राज्य विस्तृत था ।

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